Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
स्वसत्तामात्रकादन्यत्किंचित्तस्य न युज्यते ।
अन्यत्वमुररीकर्तुं व्योमानन्यमसौ किल ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म से अभिन्न जो यह जगत् है, उसके एकमात्र ब्रह्मसत्ता चे अतिरिक्त रुपकी प्रभिदि न होने
से किसी पदार्थ के नाश की ही चिदि नहीं है, यह कहते हैं /
उस ब्रह्म को स्वसत्तामात्र से अन्य कुछ भी कहना उपयुक्त नहीं है । यदि यह आशंका हो कि
“निरुक्तं चानिरुक्तं च निलयनं चानिलयनं च विज्ञानं चाविज्ञानं च सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्"
इत्यादि ब्रह्मसत्ता से अतिरिक्त रूपका कथन श्रुतियों में पाया जाता है ओर पामर लोग ऐसा
अनुभव भी करते हैं, तो इस आशंकापर कहते हैं । हाँ, इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है कि वह
ब्रह्मात्मा जगताकार से (५) अन्यरूप स्वीकार करने के लिए पहले आकाश से (५) अभिन्न अपनी
आत्मा को बना लेता है । इसका तात्पर्य यह है कि यदि वह ब्रह्म अपने से अभिन्न आकाश को बना
लेता है, तो फिर उससे भिन्न दूसरा कोई रूप उसके द्वारा स्वीकृत कैसे हो सकेगा ? अथवा सद्रूप
अनन्यत्वका सम्पादन न होने पर उसके द्वारा आकाशादि की उत्पत्ति कही जाती है, इसलिए
“निरुक्तं चानिरुक्तं च" इत्यादि श्रुतिप्रतिपादित मूरतामूर्तस्वरूप सद्रूप से अन्य है, इसकी सिद्धि
किरी तरह भी नहीं हो सकती