Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
तावत्तरङ्गत्वमयं करोति जीवः स्वसंसारमहासमुद्रे ।
यावन्न जानाति परं स्वभावं निरामयं तन्मयतामुपेतः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
जीव जब तक परब्रह्मात्मक अपने स्वभाव को नहीं जानता तब तक यह अज्ञानस्वात्मस्वरूप
संसाररूपी महासागर में जन्म-मरण भ्रमणादिरूप नाना तरंगों की कल्पना करता है । परन्तु जब
यह अपने स्वरूप को जान लेता है तब तन्मयता को प्राप्त होकर निरामय उसी स्वरूप में स्थित हो
जाता है