Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verses 14–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verses 14–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 14-18
संस्कृत श्लोक
जननं मरणं मायामोहं मान्द्यमवस्तुता ।
वस्तुता च विवेकश्च बन्धो मोक्षः शुभाशुभे ॥ १४ ॥
विद्याऽविद्या विदेहत्वं सदेहत्वं क्षणश्चिरम् ।
चञ्चलत्वं स्थिरत्वं वा त्वं चाहं चेतरश्च तत् ॥ १५ ॥
सदसच्चाथ सदसन्मौर्ख्यं पाण्डित्यमेव च ।
देशकालक्रियाद्रव्यकलनाकेलिकल्पनम् ॥ १६ ॥
रूपालोकमनस्कारकर्मबुद्धीन्द्रियात्मकम् ।
तेजोवार्यनिलाकाशपृथ्व्यादिकमिदं ततम् ॥ १७ ॥
एतत्सर्वमसौ शुद्धचिदाकाशो निरामयः ।
अजहद्व्योमतामेव सर्वात्मैवैवमास्थितः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, जन्म, मरण, माया, मोह, जडता, अवस्तुता, वस्तुता, विवेक, बन्ध, मोक्ष,
शुभ, अशुभ, विद्या, अविद्या, निराकारता, साकारता, क्षण, चिरकाल, चंचलता, स्थिरता, तुम,
मैं, इतर, वह, सत्, असत्, मूर्खता, पाण्डित्य, देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कलना, केलि, कल्पना,
बाह्य ओर आभ्यन्तर विषय, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय तथा जो यह सर्वत्र व्याप्त तेज, जल, अनिल,
आकाश और पृथिवि आदि है, वह सब शुद्ध निरामय चिदाकाश ही है । यह अपनी शुद्ध
चिदाकाशरूपता का परित्याग न करते हुए सर्वस्वरूप होकर ही स्थित है