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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । किमेतद्भगवन्सर्वनाशे नृत्यति केन सा । किं शूर्पफलकुम्भाद्यस्तस्याः स्रग्दामधारणम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व सर्ग में बड़े विस्तार के साथ समस्त प्रप का वर्णन किया ग्या हैं तथा प्रलीन हुए उत प्रपंच की नृत्य कर रही कालरात्रि के भूषण आदि भाव से अंग में उत्पत्ति एवं कृत्त श्रमण आदि का भी वर्णन किया गया हैं / इस विषय में नष्ट की पुनः उत्पत्ति की संभावना न मानते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, जब प्रलय में सब कुछ नष्ट हो गया, तब वह देवी किस अंग से नाच कर रही थी ? तथा सूप, ओखली एवं कुम्भ आदि के द्वारा, जो उस समय नष्ट हो चुके थे, उसके माला धारण का जो आपने वर्णन किया है वह क्या है ? मेरे पूछने का तात्पर्य यह है कि नष्ट हुए सूप आदि की माला को जो उसने धारण किया था, उसकी मैं कैसे संभावना करूँ ?

सर्ग सन्दर्भ

इक्यासीवाँ सर्ग समाप्त बयासीवों सर्ग अज्ञान रहने पर कलासहित तथा भलीभाँति ज्ञात हो जाने पर कलारहित चिद्रूप परमात्मा के तत्व का शोधनकर वर्णन ।