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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

चेतनत्वात्तथाभूतस्वभावविभवादृते । स्थातुं न युज्यते तस्य यथा हेम्नो निराकृति ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

चेतन ब्रह्म मे ही जगद्‌ का उपहार श्रुतिरयो में प्रस्तिद्ध है / लोक मे निकार चेतन कहीं नहीं दीखता, इसलिए जगद्‌ का सहार करनेवाले परमेश्वर मे (उमासहायं परमेशएं प्रभुंत्रिलोचन नीलकण्ठं शान्तम्‌“ इत्यादि श्रुतिप्रश्चिद्ध्‌ रूप की संभावना अवश्य करनी चाहिए, इस आशय से कहते हैं / चेतन होने के कारण वह परमेश्वर अपने चेतनस्वरूप वैभव को छोड़कर ऐसे स्थित नहीं रह सकता, जैसे कटक, केयूर आदिरूप अपनी आकृति छोड़कर सुवर्ण