Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
कथमास्तां वद प्राज्ञ चिन्मात्रं चेतनं विना ।
कथमास्तां वद प्राज्ञ मरिचं तिक्ततां विना ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कटक, केयूर आदि के आकार में परिणत हुए बिना छुवर्ण नहीं रह सकता यानी किी-
न-किसी अलंकार के रूप में छुवर्ण का परिणत हो जाना जैसे अनिवार्य हैं वेसे ही चिति में भी
चेत्याकारका अनिवार्य अवलम्बन लोक में ग्रप्तिद्ध है / इसलिए निराकारपक्ष की ही बिलकुल
असंभावना सिद्ध होती है, यह द्रढ़तापूर्वक कहते हैं ।
हे प्राज्ञ, कहिये, चेतन के बिना-चेत्य विषयाकार धारण किये बिना चिन्मात्र भला कैसे रह
सकता है ? हे प्राज्ञ, कहिये न, तिक्तता के बिना भला मिर्च कैसे रह सकता है ?