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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

स एष हरिरित्यास्ते भवत्येष पितामहः । चन्द्रोऽर्क इन्द्रो वरुणो यमो वैश्रवणोऽनलः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

मैंने अभी आपसे वर्णन किया हे वह “शिव एको ध्येयः शिवशंकरः सर्वमन्यत्‌ परित्यज्य इत्यादि श्रुतियों में रुद्रमूर्ति के नाम से उपन्यास किया है।।२०॥ वही परमात्मा विष्णु आदि के आकार से उपासना करनेवालों के लिए "हरि" वेष से स्थित हो जाता है एवं ओरों के लिए यही पितामह भी होता है । हे श्रीरामचन्द्रजी, अधिक हम आपसे क्या करं, यही परमात्मा चन्द्र, सूर्य आदि के स्वरूप की वासना से वासित बुद्धिवालों के लिए चन्द्र, सूर्य, इन्द्र, वरूण, यम, कुबेर तथा अग्निरूप धारण कर स्थित होता हैं (५)