Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
अबोधो बोध इत्येवं चिद्व्योमैवात्मनि स्थितम् ।
तस्माद्भेदो द्वैतमैक्यं नास्त्येवेति प्रशाम्यताम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदाकाशरूप ब्रह्म ही अज्ञदुष्टि से अबोधस्वरूप होकर जीव ओर जगत् के रूपसे स्थित
है तथा तत्त्वदृष्टि से वही बोधस्वरूप होकर अपने स्वरूप में स्थित है । इसलिए भेद तथा द्वैत ओर
एेक्य कुछ भी है ही नहीं, ऐसा निश्चय करके हे श्रीरामचन्द्रजी, आप शान्त हो जाइये