Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अनिलो जलदोम्भोधिर्ह्यो यद्वस्त्वस्ति नास्ति च ।
इत्येते चिन्मयाकाशकोशलेशाः स्फुरन्त्यलम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यही परमात्मा वायु, मेघ और सागर है तथा अतीतादि काल भी यही
है । तीनों काल में जिस वस्तु की सत्ता विद्यमान है ओर नहीं है वह सव परमाकाशरूप परमात्मा ही
है । हे श्रीरामचन्द्रजी, "स ब्रह्मा स हरिः सेन्दुः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स
कालोऽग्निः स चन्द्रमाः । स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् । ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः
पन्था विमुक्तये" इस तरह श्रुति में प्रतिपादित जो ये विष्णु तथा पितामह आदि भाव अच्छी तरह
स्फुरित हो रहे हैं वे सबके सब उस चिन्मय ब्रह्माकाशकोश के गुणादि-उपाधि प्रयुक्त अंशस्वरूप
हैं