Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 214
दो सौ बारहवाँ सर्ग समाप्त दो सौ तेरहवाँ सर्ग गुरु और शिष्य की कथा से श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वजन्म के संवाद का वर्णन |
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- Verse 1विस्तारपूर्वक उपदेश देने से हथेली में रखे हुए आँवले के समान साक्षात् कराये गये आत्मतत्व…
- Verse 2किसी पूर्वकल्प में आप राम थे, मँ वसिष्ठ था, उस समय भी आपको वैराम्य हुआ था, अतः आप मेरे सम…
- Verse 3वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वहाँ पर भी मैं गुरु था ओर आप शिष्य थे । मेरे सामने बैठकर उदारबुद्धि…
- Verse 4शिष्य ने कहा : हे गुरुवर, सम्पूर्णं जगत् के विषय में मेरा यह महान् सन्देह है, जिसका मैं…
- Verse 5गुरुजी ने कहा : हे पुत्र, जैसे स्वप्न- नगर सुषुप्ति अवस्था को प्राप्त हुए आत्मा का आत्माम…
- Verse 6प्रलयकाल में समस्त पृथिवी, सब पर्वत, दसो दिशाएँ, क्रिया, काल और क्रम सब कुछ समान रूप से न…
- Verse 7सब भूत नष्ट हो जाते हें । सकल जगतों के भान के साथ आकाश का भी अव्याकृत में लय होने से नाश…
- Verse 8ब्रह्मा, विष्णु आदि ही उस समय भोग्य के भोक्ता रहेगे एसी किसी को आशंका हो तो उसके निवारण क…
- Verse 9जगत् आत्ममात्र शेष रहकर विनष्ट हो जाता है, ऐसा जो कहा, उसका उपयादन करते है। अविनाशी चिद्…
- Verse 10सत् जगत् का असत्तारूप अभाव (नाश) ही सिद्ध नहीं होता है, यो शिष्य शंका करता है । शिष्य न…
- Verses 11–12श्रुति, प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति आदि से जगत् का नाश सिद्ध है, अतः उसका अपलाप नहीं किया…
- Verses 13–14केवल आपातदर्शन से जगत् की सत्ता का निश्चय कर लेना उचित नहीं है, क्योकि शुक्ति में रजत, म…
- Verse 15इसको बाध्य सिद्ध करने में जाग्रत् ओर स्वप्न का परस्पर दृष्टान्तभाव प्रसिद्ध है, ऐसा कहते…
- Verse 16दृश्य बाधित होकर कहाँ जाता है, कहाँ रहता है यह योगियों को भी ज्ञात नहीं होता, इसलिये उसकी…
- Verse 17शिष्य ने कहा : भगवन्, यदि दृश्य है ही नहीं तो दृश्य के वेष से कुछ काल तक परमार्थरूप से व…
- Verse 18गुरु ने कहा : वत्स जो यह जगत् प्रतीत होता है वह जैसे शुक्ति (सीप) अपनी चमक-दमक से रजत की…
- Verse 19यह जगत् विस्तृत आकारवाले इस चिदाकाशरूप वस्तु का रूप है, क्योकि 'द्वे वाव ब्रह्मणों रूपे…
- Verse 20जैसे अवयवी का स्वरूप अवयव के भेद से भिन्न-सा होता है वेसे ही स्फुरण ओर अस्फुरणरूप सृष्टि…
- Verses 21–22जैसे स्वच्छ जलवाले तालाब के अन्दर प्रविष्ट हुए यह तुम बिम्ब-प्रतिबिम्ब भेद के क्षय से एक…
- Verse 23जैसे स्वप्नद्रष्टा का स्वप्न में प्रसिद्ध जगत् जाग्रत् ओर सुषुप्ति में बाधित होकर सम्पू…
- Verse 24हे वत्स, बाधित हुआ अतएव शून्य नामक वह स्वप्नजगत् दूसरे स्थान में वैसे ही रहता है यह बात…
- Verses 25–36यदि हमारे अनुभव से सिद्ध सृष्टि प्रबोध से बाधित होकर दूसरे के संविदाकाश मेँ प्रविष्ट हो त…
- Verses 37–42उसी की सर्वरूप से विद्यमानता का स्पष्टीकरण करते है। यह स्वयंज्योति स्वयंप्रकाश घडा, पर्वत…
- Verses 43–46बनकर अपने शुद्ध चिन्मात्र स्वरूप को जगत् के रूप में देखता हुआ उन उन उपाधियों मे वस्तुतः…
- Verse 47हे श्रीरामचन्द्रजी, सब जीवों की अपने अपने अनुभव से सिद्ध सब पदार्थदृष्टियाँ और सब परस्पर…
- Verse 48हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले युग में आपने शिष्य के रूप में स्थित गुरुरूप मेरे मुख से निःसृत इ…
- Verse 49हे श्रीरामजी, इस जन्म में भी आपने मेरे द्वारा उपदिष्ट अति उत्तम परमार्थ वस्तु विषयक ज्ञान…
- Verse 50हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सकल दृश्य पदार्थो से मुक्त हो चारों ओर प्रकाशमान सर्वस्वरूप आत्मा…