Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
भवबहुलनिशावसानहर्षादिति घनमुत्सवमेव सप्तरात्रम् ।
दशरथनृपतिः सदानभोगश्रियमकरोत्पदमक्षयं समेतः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, इस जन्म में भी आपने मेरे
द्वारा उपदिष्ट अति उत्तम परमार्थ वस्तु विषयक ज्ञान, जो संसाररूपी लम्बी रात्रि के अन्धकार की
(अज्ञान की) निवृत्ति करने के कारण पूर्ण चन्द्रमा के बिम्ब के समान स्थित है, सम्पूर्णतः सुन लिया है
उससे आप अज्ञानान्धकार को हटाकर निरतिशय आनन्दरूप परमपुरुषार्थ के लाभरूप अभ्युदयवान्
होकर निर्मलबोधरूप हो गये हैं । यों कृतकृत्य हुए आप कुलाचार प्राप्त राज्यपालन आदि कार्य
कीजिये