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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

किंजल्कजालदिवसान्तघनाङ्गरागा वातावधूतसितकेसरगौरहारा । पुष्पोदरोत्थमृदुसीकरशीतलाङ्गा प्राप्ता स्वयं सुरपुरादिव पुण्यलक्ष्मीः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी पूर्वकल्प में आप राम थे, मँ वसिष्ठ था, उस समय भी आपको वैराम्य हुआ था, अतः आप मेरे समीप वन में आये थे तथा मुझसे प्रश्न किया था इत्यादिरूप यह चित्प्रतिभा गुरुशिष्यरूप से आज की तरह हुई थी