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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सा पुष्पवृष्टिरथ दुन्दुभिनादगर्जत्किंजल्कपुञ्जजलदा शममाजगाम । आपूरिताखिलसभा हिमहारिपुष्पपूरेण कौतुकविकासकरीक्षणेन ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

शिष्य ने कहा : हे गुरुवर, सम्पूर्णं जगत्‌ के विषय में मेरा यह महान्‌ सन्देह है, जिसका मैं आगे आपसे निवेदन करता हूँ, इसे आप निवृत्त करने की कृपा कीजिये । वह यह कि महाकल्प में कौन वस्तु नष्ट होती है ओर कौन नहीं ?