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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verses 25–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verses 25–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 25-32

संस्कृत श्लोक

नारद उवाच । यन्न श्रुतं ब्रह्मलोके स्वर्गे भूमितले तथा । कर्णौ तज्ज्ञानमाकर्ण्य यातौ मेऽद्य पवित्रताम् ॥ २५ ॥ लक्ष्मण उवाच । हार्दं बाह्यं च तिमिरमपमृष्टवता त्वया । मुने परमभानुत्वं नूनं नः संप्रदर्शितम् ॥ २६ ॥ शत्रुघ्न उवाच । निर्वृतोऽस्मि प्रशान्तोऽस्मि प्राप्तोस्मि परमं पदम् । चिराय परिपूर्णोऽस्मि सुखमासे च केवलम् ॥ २७ ॥ दशरथ उवाच । बहुजन्मोपलब्धेन पुण्येनायं मुनीश्वरः । धीरः कथितवान्नस्तद्येन पावनतां गताः ॥ २८ ॥ श्रीवाल्मीकिरुवाच । इति तेषु वदत्स्वत्र सभ्येषु सह भूभृता । वसिष्ठः स उवाचेदं ज्ञानपावनया गिरा ॥ २९ ॥ राजन्रघुकुलैकेन्दो यदहं वच्मि तत्कुरु । इतिहासकथान्ते हि पूजनीया द्विजातयः ॥ ३० ॥ तदद्य ब्राह्मणौघांस्त्वं सर्वकामैः प्रपूरय । वेदार्थसमनुष्ठानफलं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ३१ ॥ मोक्षोपायकथावस्तुसमाप्तौ द्विजपूजनम् । शक्तितः कीटकेनापि कार्यं किमु महीभृता ॥ ३२ ॥ इति मौनं वचः श्रुत्वा सहस्राणि नृपो दश । दूतैराकारयामास द्विजानां वेदवादिनाम् ॥ ३३ ॥ मथुरायां सुराष्ट्रेषु गौडेषु च वसन्ति ये । तेभ्यः कुलेभ्यःसोऽभ्यर्च्य समानीय द्विजन्मनाम् ॥ ३४ ॥ अधिकात्यधिकज्ञानप्रकृतद्विजभोजनः । तदा दशसहस्राणि भोजयामास भूपतिः ॥ ३५ ॥ यथाभिमतभोज्यान्नदानदक्षिणया तया । एवं संपूज्य तान्विप्रान्पितृन्देवान्नृपांस्तथा ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि हमारे अनुभव से सिद्ध सृष्टि प्रबोध से बाधित होकर दूसरे के संविदाकाश मेँ प्रविष्ट हो तो दूसरों को बोध से शुद्ध चिदाकाश का स्फुरण नहीं ही होता है ऐसी कल्पना करनी होगी । उसमें कल्पक कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा कहते हैँ । जैसे बोध से सृष्टि का क्षय होने पर हमारे संविदाकाश का स्फुरण होता हे वैसे ही बोध से दूसरे के संविदाकाश में शुद्ध चिदाकाश का स्फुरण नहीं होता है इसमें क्या प्रमाण है ? शिष्य ने कहा : भगवन्‌, आपके कथनानुसार हमारी संविद्‌ की विषयभूत सृष्टि का यदि दूसरे की संवित्‌ में भान नहीं होता है तो जैसे स्वप्नद्रष्टा से अन्य यानी जाग्रत्‌ पुरुष दृश्य की बुद्धि से युक्त (दृश्यधीसहित) रहता हे वैसे ही प्रलय काल में भी दूसरे पुरुष में जगत्‌ आदि बुद्धि (दृश्यबुद्धि) है यानी दूसरा पुरुष दृश्यबुद्धि है, ऐसा मैं समझता हूँ। गुरु ने कहा : हे वत्स, हे महाबुधे, जो कहते हो वह ठीक है, इसीलिए प्रलय में भी एेन्दव जगतां के सद्भाव का दर्शन ब्रह्मा को है, ऐसा पहले हम वर्णन कर आये हैँ । यदि जगत्‌ चित्‌ का स्वरूप होता तो वह सर्वसाधारण होता किन्तु जगत्‌ चित्‌ का स्वरूप नहीं है अपितु चित्‌ में अध्यस्त होकर वह द्रष्टाओं को भासता है अन्यो को वैसा ही नहीं भासता, इसलिए तत्‌ तत्‌ पुरुषों के अनुसार उसका स्वरूप व्यवस्थित है । सबको एक-सा प्रतीत नहीं होता है, इसलिए वह न तो तुच्छ है और न कुछ सत्‌ ही है किन्तु तत्‌ तत्‌ जीवों के चिदाकाश का स्फुरण मात्र ही हे । उसमें सत्‌ ओर असत्‌ दृष्टियाँ कैसी यदि वह चिदाकाश के रूप से है ऐसा कहो तो ऐसी अवस्था में वह सारा का सारा जगत्‌ सब प्रकार से सब जगह है किन्तु स्वरूप से (जगत्स्वरूप से) वह सारा का सारा कुछ नहीं है, कभी भी ओर कहीं पर भी उसकी सत्ता नहीं हे । चूँकि वह ब्रह्म सत्‌ ओर असत्‌ स्वरूपवाला है (स्वरूप से सत्‌ वृत्तियों से तिरोहित होने के कारण असत्‌ है) अतएव सारा जगत्‌ भी सदा सत्‌ ओर असत्‌ भासता हे चकि चिदाकाश अविनाशी है अतएव तन्मय जगत्‌ भी अविनाशी ही है । चूँकि वह सत्‌ चिदाकाश ही सृष्टि ओर प्रलय का रूप धारण करता है | वही स्वरूपतः अपरिज्ञात होने से दुःखदायक होता है यह चिदाकाश है यों ज्ञात हो जाने पर तो सकलदुःखों का क्षय हो जाता हे । यह सब चिदाकाश अपने परिज्ञान के अनुसार ज्ञानी ओर अज्ञानी की दृष्टि में क्रमशः सर्वत्र सर्वदा सर्वथा विद्यमान है और सर्वत्र सर्वदा सर्वथा विद्यमान नहीं हे