Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नैव मेऽद्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
यथा स्थितोऽस्मि तिष्ठामि तथैव विगतज्वरः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
शिष्य ने कहा : भगवन्, यदि दृश्य
है ही नहीं तो दृश्य के वेष से कुछ काल तक परमार्थरूप से वस्तु-सा कैसे प्रतीत होता है और वही फिर
बोध होने के बाद वैसा प्रतीत नहीं होता ह सो किस कारण ? यह किस विस्तृत आकारवाले चिदाकाशरूप
वस्तु का रूप है ?