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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

स्मृत्वा स्मृत्वाऽमृतासेकसौख्यदं वचनं तव । अर्हितोऽपि च शान्तोपि हृष्यामीव मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य बाधित होकर कहाँ जाता है, कहाँ रहता है यह योगियों को भी ज्ञात नहीं होता, इसलिये उसकी असत्ता ही शरण है, इस आशय से कहते है। जैसे जाग्रत्‌ काल में बाधित होकर स्वप्ननगर न मालूम शीघ्र कहाँ चला जाता है वैसे ही ज्ञान से बाधित हुआ जगद्रूप दृश्य न जाने शीघ्र कहाँ चला जाता हे