Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
न शत्रुर्न च मित्रं मे न क्षेत्रं दुर्जनो जनः ।
दुर्बोधैषा जगत्क्षुब्धा शान्ता सर्वार्थसुन्दरी ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् विस्तृत आकारवाले इस चिदाकाशरूप
वस्तु का रूप है, क्योकि 'द्वे वाव ब्रह्मणों रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च“ (ब्रह्म के मूर्तं ओर अमूर्त दो रूप हैं) ऐसी
भगवती श्रुति हे । अपने निर्मल स्वरूप का त्याग न करता हुआ ही चिदाकाश इस प्रकार जगत् के रूप से
भासता है