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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

मायापूर्णपुराभोगैर्मृगतृष्णानदीरयैः । आयतौ पवनस्पर्शैर्द्विचन्द्रानुभवोदयैः ॥ ११ ॥ मदभ्रंशपुरस्पन्दैर्मुधा त्ववनिकम्पनैः । बालयक्षाद्यनुभवैः खकेशोण्ड्रकदर्शनैः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रुति, प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति आदि से जगत्‌ का नाश सिद्ध है, अतः उसका अपलाप नहीं किया जा सकता है । इसलिए उक्त श्रुति, प्रत्यक्ष, अनुमान आदि के बल से आपातदर्शन से (स्थूल दृष्टि से) सत्य प्रतीत का ही अपलाप किया जाता है, यो कोई दोष नहीं है इस आशय से गुरु समाधान करते हैं। वत्स, तुम्हारा कथन युक्तियुक्त नहीं है, यह जगत्‌ अवश्य विनष्ट होता ही है, क्योकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से सावयव पदार्थो के नाश की प्रसिद्धि हे इसलिए वह है ही नहीं अतः असत्‌ इसका अस्तित्व नहीं है यह तुमने अनुकूल ही कहा है और सत्‌ का तो अभाव होता नहीं हे । जो वास्तव में है ही वह कभी भी कुछ अभावात्मक असत्‌ नहीं है उसका सद्भाव (अस्तित्व) कैसे असत्ता को प्राप्त हो सकता हे ?