Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
विश्वामित्र उवाच ।
अहो बत महत्पुण्यं श्रुतं ज्ञानं मुनेर्मुखात् ।
येन गङ्गासहस्रेण स्नाता इव वयं स्थिताः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्नद्रष्टा का
स्वप्न में प्रसिद्ध जगत् जाग्रत् ओर सुषुप्ति में बाधित होकर सम्पूर्णतः शान्त हो जाता है वैसे ही यह
हमारा जगत् भी ज्ञान से बाधित होने पर शान्त हो जाता है