Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अनन्यैः पवनस्पन्दैरनन्यैः सलिलद्रवैः ।
इन्द्रजालपुरापूरैर्गन्धर्वनगरोत्करैः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सत् जगत् का असत्तारूप अभाव (नाश) ही सिद्ध नहीं होता है, यो शिष्य शंका करता है ।
शिष्य ने कहा : हे गुरुवर, असत् पदार्थ की सत्ता नहीं है ओर सत् पदार्थ का अभाव नहीं है यह
नियम है । ऐसी परिस्थिति में यह विद्यमान (सत्) विशाल जगत् कैसे कहाँ चला जाता है ?