Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
वासांसि वसिताश्चित्राण्युत्तमस्रग्विभूषणाः ।
चेरुः परिचराश्चेट्यश्चारुगन्धा नृपाध्वरे ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, सब जीवों की अपने अपने अनुभव से
सिद्ध सब पदार्थदृष्टियाँ और सब परस्पर विलक्षण विधिनिषेधदृष्टियाँ तत् तत् संकल्प, तत् तत् अनुभव,
तत् तत् वासनासहित तत् तत् काम-कर्मपूर्वक हैं इसलिये तत् तत् व्यवहार में सदा ही तत् तत् विभिन्न
अर्थक्रिया में समर्थ होने से सत्यरूप हँ किन्तु आत्मदृष्टि से खरगोश के सींग के तुल्य असत्य हैं, क्योकि
प्रत्यगात्मा का रूप अपने अनुभव के अनुसार जगत् का रूप धारण करता है