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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 210

दो सौ आठवाँ सर्ग समाप्त दोसौ नौवाँ सर्ग परस्पर विरुद्ध फल देनेवाले कर्मो के भोगोँ की एक साथ प्राप्ति होने से अविरोध द्वारा सफलता का युक्ति से साधन।

31 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वांछित फल देनेवाले प्रयाग आदि क्षेत्र में एक ही पुरुष के मित्र ने उ…
  2. Verses 2–3राजन्‌, ब्रह्म ने सृष्टिरूप अपने संकल्पनगर में प्रयागादि सब कामनाप्रद क्षेत्रों तथा सब पद…
  3. Verse 4से क्‍या फल होता है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। पापी श्रद्धालु पुरुष का प्रयाग आदि पुण्य क्ष…
  4. Verse 5यदि शास्त्रों द्वारा शिक्षणीय (शिक्षाप्राप्तियोग्य) पुरुष में पाप की मात्रा कम हो और तीर्…
  5. Verse 6हे राजन्‌, लेकिन जहाँ पर शास्त्र द्वारा शिक्षणीय पुरुष का पाप पुण्यकषत्रार्जित धर्म के बर…
  6. Verse 7पापों और पुण्यों का महान्‌ फलरूप इस प्रकार का जो जो जैसे ब्रह्म संकल्प से स्फुरित होता है…
  7. Verse 8ब्रह्म के संकल्प से कवित (स्फुरित) है ऐसा कहा इसमें क्या वह ब्रह्म है, अथवा जगत्‌ उसके सं…
  8. Verse 9ब्रह्म के संकल्प के अनुसार ही शास्य (शासनयोग्य) पुरुष की पुण्यक्षेत्रों में उपार्जित पुण्…
  9. Verse 10कैसी-कैसी प्रतिभा उदित होती हैं ? उनका उल्लेखमूर्वक निरूपण करते हैं। यह मैं आज अकेला ही म…
  10. Verse 11इसका मरण जैसे प्रतिभारूप है वैसे ही इसके बन्धुओं का भी मरने पर सर्वत्र प्रसिद्ध रोना, शव…
  11. Verse 12लेकिन जब मनुष्यों के अति उत्कट पाप अथवा पुण्य होते हैं तब क्षुब्ध हुए अपने पाप अथवा पुण्य…
  12. Verse 13वे भी (सर्व साधारण लोग भी) कहीं पर अति उत्कट पुण्य अथवा पापों से शास्य (शासन योग्य) को अच…
  13. Verse 14मित्र और शत्रु के पृथक्‌ पृथक्‌ कर्मो से शास्य (शासन योग्य) एक पुरुष स्नेहसंवित्रूप जीव न…
  14. Verse 15क्या वह दूसरे शरीर से अपने को जरा-मृत्युहीन ओर सुखी जानता है ? इस प्रश्न पर नकारात्मक उत्…
  15. Verse 16शत्रु द्वारा किये गये अभिचार के (तंत्र, मंत्र, शाप आदि द्वारा मारण के) प्रतीकार से रहित श…
  16. Verse 17उसके सब बन्धुबान्धव भी उसको वैसे ही अमर देखते हैं इस तरह जीवन ओर मरण दोनों उसको एक साथ प्…
  17. Verse 18इसी न्याय से सब विरुद्ध प्रश्नों का समाधान समझना चाहिये, इस आशय से कहते हैं। यह अप्रतिहतर…
  18. Verse 19संकल्पनगर और स्वप्ननगर में जो भ्रान्ति मालूम होती है जाग्रत्रूप स्वप्न में उससे अधिक ही य…
  19. Verse 20धर्म और अधर्म दोनों अमूर्त हैं, उन दोनों की मूर्तता कैसे ?“ इस प्रश्न को प्रस्तुत चर्चा क…
  20. Verse 21धाता का सत्यसंकल्प अमूर्त को भी मूर्तिमान्‌ बनाने में समर्थ है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी उत…
  21. Verse 22जैसे हम लोगों के संकल्पनगर में ऐसा कोई नहीं है जो संभव न हो सके वैसे ही इस ब्रह्म के संकल…
  22. Verse 23जैसे स्वप्ननगर और संकल्पनगर में एक ही चिति लाखों रूप धारण करती है वैसे ही जाग्रत्स्वप्न म…
  23. Verses 24–26जैसे चिति जाग्रत्‌ में एक से अनेक रूप होती है वैसे ही जहाँ पर लाखों एकरूप होते हैं वह सुष…
  24. Verse 27इस प्रकार यह भ्रान्ति देदीप्यमान चिदाकाशमय ही प्रतीत होती है यहाँ पर न कुछ सत्‌ है, असत्‌…
  25. Verse 28जिस जिसका जैसे अनुभव होता है वह वैसा ही है । तत्त्वदर्शी पुरुष को इस विषय में क्या असमंजस…
  26. Verses 29–30धर्म ओर अधर्म का आचरण करनेवाले लोग भी शास्त्र द्वारा अर्जित अपने अपने निश्चय के अनुसारी स…
  27. Verses 31–32यदि मिथ्या होने के कारण यह असमंजस है, ऐसी आपकी मति है तो यह लोक, इसमें किया गया धमदि का अ…
  28. Verses 33–34जैसे तुम्हारे संकल्पनगर में सकल पदार्थो का असंभव है ही नहीं यानी सकल पदार्थो का वहाँ पर स…
  29. Verses 35–36उस प्रकार से संनिवेश नियम से ही यहाँ ज्ञानेन्द्रियो द्वारा सब वस्तुओं का भलीर्भोति (ठीक ठ…
  30. Verse 37ब्रह्म के संकल्प में जैसे जगत्‌ का भान हुआ वैसे ही वह प्रलयपर्यन्त स्थित रहा । फिर प्रलय…
  31. Verses 38–42हे राजन्‌, तुम संकल्पनगररूप इस जगत्‌ में जो जो नहीं हो सकता है समझते हो वह कुछ नहीं है या…