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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

वेदनावेदनाकारा स्पन्दास्पन्दात्म वै पुनः । चिन्मात्रस्यास्य तद्भ्रान्तिशान्तौ शान्तात्म निर्मलम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

मित्र और शत्रु के पृथक्‌ पृथक्‌ कर्मो से शास्य (शासन योग्य) एक पुरुष स्नेहसंवित्रूप जीव ने यानी मित्र ने प्रयागादि तीर्थक्षेत्र में जैसी प्रार्थना की थी वैसे स्थित जरा और मृत्यु से रहित अपने को दुःखशून्य (सुखी) जानता है