Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योम चास्ति सर्वत्र सर्वं चैतज्जगन्मयम् ।
सर्वं ब्रह्ममयं शान्तं जगदित्यपि शब्दितम् ॥ ३१ ॥
यथास्थितमिदं विश्वं तथासंस्थमनामयम् ।
ब्रह्मैव निरवद्यात्म चित्संकल्पपुराकृति ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि मिथ्या होने के कारण यह असमंजस है, ऐसी आपकी मति है तो यह लोक, इसमें किया गया
धमदि का अनुष्ठान, उससे परलोक की प्राप्ति ओर उसमें सुख-दुःखभोग यह सारा का सारा जगत्
असमंजस ही है, ऐसा कहते हैं।
इस जगत् में जो कार्य किया जाता है, उसका फलभोग परलोक में प्राप्त होता है । इस प्रकार इस
संकल्पनगर में सब कुछ ही असमंजस हे ॥३ ०॥ यदि जगत् में कुछ भी भूत, भुवन आदि वस्तु सत्य हो
तो उसमें यह विरोध होता तब यह समंजस है यह असमंजस है इस प्रकार का न्याय सम्पूर्ण अकुंठित
होता किंतु सभी द्रष्टा संवित्रूप हैं, अत: उनका अपना संकल्प ही दृश्य के रूप से स्थित है, वास्तविक
नहीं हे । चूँकि जगत् भी ब्रह्मस्वरूप से स्थित चित् के संकल्परूप ही हैं, अतः इस असमंजसता का
परिहार करनेवाले न्याय की जो स्वप्न ओर संकल्प की कल्पनाओं मे अनुभव के अनुसार स्थित हे,
जगतों में भी योजना करनी चाहिये