Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verses 33–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 33,34
संस्कृत श्लोक
असंभवादन्ययुक्तेर्युक्तिरेषैव शोभना ।
अयुक्त्यनुभवं तूक्तं नार्थिनामिह शोभते ॥ ३३ ॥
लोके शास्त्रेऽथ वेदादौ यत्सिद्धं सिद्धमेव तत् ।
सदस्त्वसद्वात्मनि तद्धातुं शक्यं न वा क्वचित् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तुम्हारे संकल्पनगर में सकल पदार्थो का असंभव
है ही नहीं यानी सकल पदार्थो का वहाँ पर संभव हे वैसे ही ब्रह्म के संकल्परूप जगत् में भी किसी पदार्थ
का असंभव नहीं हे । ब्रह्म के संकल्प में जिसकी जिस प्रकार कल्पना की वह जब तक संकल्प रहता है
तब तक उस प्रकार के संनिवेश से युक्त वैसे ही स्वभाव से रहती है