Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
दानादिचिह्नितधियः परत्र स्वप्नवत्फलम् ।
पश्यन्त्यमूर्तामूर्ताभमजं चिन्मूर्तिकल्पनात् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
वे भी
(सर्व साधारण लोग भी) कहीं पर अति उत्कट पुण्य अथवा पापों से शास्य (शासन योग्य) को
अचेतन शवरूप में पड़ा मरा हुआ देखते हैं, रोते हैं और उसके बन्धु-बान्धवों के साथ उसे चिता
की अग्नि में डालते हैं