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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

राजोवाच । सर्गादौ भगवन्देहमिदं चिन्मात्रकल्पनम् । कथं भाति कथं कुड्यं विना दीपः प्रकाशते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी न्याय से सब विरुद्ध प्रश्नों का समाधान समझना चाहिये, इस आशय से कहते हैं। यह अप्रतिहतरूप से आविर्भूत त्रैलोक्य केवलमात्र भ्रमरूप हे भ्रान्ति में क्या भ्रान्तिविपरीत नहीं हो सकता। स्वप्न, संन्निपात आदि में लाखों विरुद्ध विरुद्ध बातें एक साथ होती दिखाई देती हैं