Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्राभमितो दानादमुत्रात्तमवाप्नुयात् ।
संकल्पात्मेति कवयः कथं तन्नोपलभ्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या वह दूसरे शरीर से अपने को जरा-मृत्युहीन ओर सुखी जानता है ? इस प्रश्न पर नकारात्मक
उत्तर देते हैं।
वह वर्तमान यथास्थित देह से अपनी जीवितावस्था का अनुभव करता है । तब उसके शत्रु का
मनोरथ कैसे सिद्ध होगा ? यानी जिसने प्रयाग आदि कामनाप्रद प्रदेश में मृत्यु के समय उसके शीघ्र
मरण की कामना की थी उसके संकल्प की सिद्धि कैसे होगी ? यह यदि शंका हो तो सुनो । प्रयाग
आदि पुण्यतीर्थ में शत्रु की मृत्यु करानेवाले पुण्य का आचरण करनेवाले शत्रु से जवर्दस्ती मरने के
लिए प्रेरित होकर वह दूसरे मित्र, स्वजन आदि से अदृश्य शरीर से उसी समय में मृत्यु का भी अनुभव
करता है