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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

दानौर्ध्वदेहिकतपोजपादीनां परत्र यत् । अमूर्तानां फलं मूर्तं तदिदं कथ्यते श्रृणु ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

लेकिन जब मनुष्यों के अति उत्कट पाप अथवा पुण्य होते हैं तब क्षुब्ध हुए अपने पाप अथवा पुण्यों से महात्मा पुरुषों द्वारा निग्रह-अनुग्रह दृष्टि से देखे जाने पर दूसरे पुरुषों द्वारा लक्ष्य (देखने योग्य) अथवा अन्य पुरुषों द्वारा अलक्ष्य (देखने के अयोग्य) पुण्य अथवा पापों के फलभूत शरीर आदि चित्संकल्पवश होते हैं