Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
तदेवेत्थं परिज्ञातं ब्रह्मतामुपगच्छति ।
यदा तेन समं विश्वं स्थितमेव विलीयते ॥ ३५ ॥
न्यायेनैतदिहोक्तेन लोकवेदादि सिध्यति ।
सर्वं स जीवन्मुक्तत्वमेष एवोचितस्ततः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार से संनिवेश
नियम से ही यहाँ ज्ञानेन्द्रियो द्वारा सब वस्तुओं का भलीर्भोति (ठीक ठीक अविसंवादरूप से) दर्शन
होता है तथा कर्मेन्द्रियो के व्यवहार में संकरता भी नहीं होती । चित् के पूर्णप्रयत्न से नियत शरीर-
संगठनवाला (आकार-प्रकारवाला) पदार्थ चित् के अन्य प्रयत्न के बिना अन्यथा भी नहीं होता