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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

यदेव ब्रह्मदेहोऽसौ स्वप्नाभः स्वप्न एष तु । त्वद्वोधायोच्यते युक्तिर्न तु तत्स्वप्न एव तु ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

धाता का सत्यसंकल्प अमूर्त को भी मूर्तिमान्‌ बनाने में समर्थ है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महामते, ब्रह्म के संकल्पनगररूप इस जगत्‌ में क्या सत्य (संगत) नहीं हो सकता अथवा क्या असंगत नहीं हो सकता ?