Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
पूर्णात्पूर्णं प्रसरति पूर्णमेव स्थितं जगत् ।
न च भातं न चाभातं शिलाबद्धोदरोपमम् ॥ २९ ॥
यतो जगच्चिदुन्मेषो व्योमात्माप्रतिघं ततः ।
चिन्मात्रं यत्र यत्रास्ति तत्र तत्रोचितं जगत् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
धर्म ओर अधर्म का आचरण करनेवाले लोग भी शास्त्र द्वारा अर्जित अपने अपने निश्चय के अनुसारी
स्वर्गो को ही प्राप्त करते हैं, ऐसा कहते है ।
वहाँ स्वर्ग में देवताओं के उपभोग्य तथा अमृतमय जलवाले झरने, तालाब, फल, फूल आदि से
पूर्ण पर्वत हें । यह शास्त्र से जानकर उसके अनुसार संकल्प होने पर यहाँ धर्म का अनुष्ठान किया जाय
तो वहाँ पर पहुँचकर धमनुष्ठानकर्ता वैसे पर्वतो को क्या प्राप्त नहीं हुआ यानी उनको प्राप्त हुए
स्वात्मा का अनुभव क्यों नहीं करता है ?