Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 140

एक सौ अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उनतालीसवाँ सर्ग प्राण की अपेक्षा चित्त की प्रधानता का वर्णन ओर सुषुप्ति अवस्था से स्वप्नअवस्था में आनेपर मुनिका विस्तारपूर्वक प्रलयदर्शन वर्णन ।

24 verse-groups

  1. Verses 1–2चित्त सदा ही प्राण के अधीन है यह स्वीकार कर अध्यारोप क्रम से चित्त की प्रथम उत्पत्तिमात्र…
  2. Verse 3स्वप्न, मनोरथ आदि के शरीरो में प्राण के अभाव में भी मनका व्यापार दृष्टिगोचर होता है, अतः…
  3. Verse 4हे रामजी, जहाँ जहाँ मन ने प्राण के साथ शरीर की कल्पना की, वहाँ-वहाँ सर्वज्ञ तुरन्त माया स…
  4. Verse 5देह और प्राण की कल्पना करने के बाद मैं फिर कभी भी देह और प्राण से वियुक्त होकर नहीं टिक स…
  5. Verse 6क्योंकि विपरित दृढ़ निश्चय की यथार्थ दृढ़ निश्चय के बिना निवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा कहते…
  6. Verse 7जिस पुरुष का यह मैं हूँ इस प्रकार का भ्रान्तिज्ञान है, उसका वह भ्रान्तिज्ञान आत्मज्ञान के…
  7. Verse 8दढतर तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए यह ग्रन्थ ही उत्तम उपाय है, ऐसा कहते हैं। मोक्ष-प्राप…
  8. Verse 9"अहम्‌" (मैं) “इदम्‌” (यह) यह दुविधा (द्वैत) ही अविद्या है, इससे अन्य अविद्या कहीं भी नही…
  9. Verse 10मन ने जैसा अभ्यास किया वैसा ही उसको प्राप्त हुआ । प्राण ही मेरा जीवन है परम प्रिय है इस त…
  10. Verse 11इसी तरह मन देह के अधीन भी है ऐसा कहते हैं। देह के सौम्य रहनेपर देहगत सौम्यता को प्राण में…
  11. Verses 12–13अतएव प्राण निरोध के अभ्यास के बिना कदापि आत्मज्ञानोन्मुख नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं। जब प…
  12. Verses 14–15मन और प्राण एक दूसरे का अनुसरण क्यो करते हैं। इस प्रश्नपर कहते हैं। यों परस्पर एक दूसरे क…
  13. Verse 16प्राण और मन जबतक समानरूप से अपना कार्य करते रहते हैं तब तक समान व्यवहाररूप जाग्रत चलता है…
  14. Verse 17कब मन शान्त होता है ? ऐसा यदि कोई प्रश्न करे, तो उसपर कहते हैं। नाड़ियों के अन्नरस, पित्त…
  15. Verse 18नाड़ियों के अन्नरस आदि से पूर्ण होने अथवा श्रमवश कमजोर हो जानेपर जब प्राण गतिरहित हो जाता…
  16. Verse 19मर्दनवश नाडयो मेँ मृदुता आने एवं बाण के घाव, व्रण आदि से पूर्ण होने से भी सुषुप्ति होती ह…
  17. Verses 20–32महामुनि ने कहा : तदुपरान्त जिसके हृदय में मैं प्रविष्ट हुआ था, वह रात्रि के समय आहार से ख…
  18. Verses 33–41इस प्रकार का तमाशा क्षणभर देख रहा, बहाव के चपेटे में पड़ा हुआ मैं ज्यों ही दीनहीन होकर रो…
  19. Verses 42–51हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, (७) इतने में उस समय वहाँपर जन्मभर का चिरकालिक अभ्यास होने और च…
  20. Verse 52प्रलय-काल की जलराशि में देवता, दानव, ओर नागो के महलों की दीवारों के हिस्से, स्वर्णमय नौका…
  21. Verses 53–60ठह रहे मणिमय महल के अन्दर बैठे हुए ये देवराज इन्द्र इस प्रलय-काल की जलराशि में फँसकर कुंक…
  22. Verses 61–62हा, परस्पर एक दूसरे पर लिपट रहे दैत्य और दानवों का अपने लिए या अपनी स्त्रियों के लिए किये…
  23. Verses 63–64हाय, खेद है, सर्वजन प्रसिद्ध सूर्य को जलराशि भँवरों के चक्कर में लपेटकर वेग से बहुत नीचे…
  24. Verses 65–67देवता, दैत्य, सर्प, मनुष्य, नाग, अप्सराएँ ओर चारणो से व्याप्त काल द्वारा उखाड़कर मिट्टी म…