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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 42–51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verses 42–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 42-51

संस्कृत श्लोक

नानादिग्देशशैलोर्वीव्यवहारमनोहरे । कथाप्रसङ्गे कस्मिंश्चिन्नानाविधरसाश्रये ॥ ४२ ॥ सर्वं चिन्मात्रमेवेदमनन्तमविकारि च । जगत्तयेव कचति यथास्थितमपि स्थितम् ॥ ४३ ॥ इत्यहं बोधितस्तेन बोधैकघनतां गतः । स्मृतवांस्तमशेषेण वृत्तान्तं धारणावशात् ॥ ४४ ॥ तदास्यं निर्गमद्वारमथ जानामि नो यदा । विस्तीर्णे भुवने यस्मिन्भूम्यब्ध्यद्रिसरिद्वृते ॥ ४६ ॥ तदा तमत्यजन्नेव देशं बन्धुजनावृतम् । तस्य प्राणं प्रविष्टोऽहं निर्गन्तुं पवनं बहिः ॥ ४७ ॥ इहस्थस्य विराजोऽस्य बाह्यमाभ्यन्तरं तथा । अन्यजं सर्वमीक्षेऽहमिति निर्णीय तादृशम् ॥ ४८ ॥ धारणां संविदा बद्ध्वा प्रदेशं स्वं तमत्यजम् । तत्प्राणैः सह निर्यात आमोदः कुसुमादिव ॥ ४९ ॥ पवनस्कन्धमासाद्य प्राप्य तन्मुखकोटरम् । बहिर्वातरथेनाहं निर्गतो दृष्टवान्पुरः ॥ ५० ॥ यावत्तथैव मद्देहो बद्धपद्मासनः स्थितः । क्वापि मुन्याश्रमः शिष्यैः पालितो गिरिकन्दरे ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, (७) इतने में उस समय वहाँपर जन्मभर का चिरकालिक अभ्यास होने और चित्त के अत्यन्त खिन्न होने के कारण मुझे समाधिमय अपने पूर्वस्वरूप का स्मरण हो आया। अरे अन्य जगत्‌ में मे तपस्वी था । किसी दूसरे प्राणी का स्वप्न देखने की इच्छा से उसके हृदय में प्रविष्ट होकर मैं स्वप्न में यह भ्रम देख रहा हू । उसके बाद स्वप्न प्रपंच के दृढ़ अभ्यास के कारण पैदा हुए मिथ्या ज्ञानमय देह में तरंगों द्वारा बहाये जाते हुए भी मैंने सुख की साँस ली । प्रलय-काल के समुद्र की यह चहल-पहल सब मैंने मिथ्या ही देखी, जिसमें पर्वत, नगर, गाँव, भूभाग और पेड़ बह रहे थे, देवता, सर्पराज, नर-नारी तथा आकाशचारी बह रहे थे तथा महान्‌ आरम्भवाले लोकपालों के नगर और गृह बह रहे थे । इसके बाद पहाड़ों से मिश्रित जलकल्लोलों की पहाड़ों से बार-बार टक्करों का निरीक्षण कर रहे मैंने यह विचार किया । आश्चर्य है यह भगवान्‌ त्रिनयन भी समुद्र में जीर्णशीर्ण पत्ते की तरह बहाये जा रहे हैं । हाय, दुष्ट देव का कुछ भी अकर्तव्य नहीं है, वह सब कुछ कर सकता है । जैसे प्रातःकाल जल में सूर्यकिरणें विकसित (खिले हुए) कमल दिखलाती है वैसे ही ये घर भी चारों तरफ की दीवारों के ढह जाने से प्रकटाशयता की शोभा को दिखा रहे हे । विविध विलासों से विभूषित परागों से सफेद बने हुए भँवरों की पंक्ति ऐसे हार धारण कर रहीं तथा मुख, हाथ, चरण आदि रूप कमलवाली ये गन्धर्व, किन्नर, मनुष्य, देवता ओर नागों की नारियाँ बहुत से आवर्तो से युक्त, परागधवल भ्रमरपंक्तिरूपी हार धारण कर रही तथा कमलवती नदियाँ ही हे । प्रसिद्ध नदियाँ न तो सारी की सारी निर्मल ही हैं और न जंगम ही हैं, ये तो उनसे विलक्षण हैं, अतएव तरंगराशियों में विचित्ररूप से उललसित होती है