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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

कदाचित्क्रमशो नाशः कल्पान्ते संप्रवर्तते । अशङ्कितं कदाचिद्द्रागेकधादिविकारतः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न, मनोरथ आदि के शरीरो में प्राण के अभाव में भी मनका व्यापार दृष्टिगोचर होता है, अतः "उसके बिना मैं नहीं टिक सकता“ यह संकल्प व्यभिचरित हो गया, ऐसी शंका कर कहते हैं। सचमुच मैं प्राण के बिना टिक नहीं सकता हूँ , किन्तु स्वप्न, मनोराज्य आदि की देहों में कुछ काल के लिए प्राण के बिना भी अवश्य रह सकता हूँ, ऐसी भी उसने कल्पना की