Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
तारागणैश्च पातालगतैर्मणिमयोदरम् ।
आवर्तेषु परावृत्तैः स्फारमद्रिजरत्तृणैः ॥ १४ ॥
हेमद्वीपोपमैर्व्याप्तं गीर्वाणपुरमन्दिरैः ।
भ्रमत्सुराङ्गनालीननलिनीजालमालितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मन और प्राण एक दूसरे का अनुसरण क्यो करते हैं। इस प्रश्नपर कहते हैं।
यों परस्पर एक दूसरे का स्वभावतः अनुसरण करने वाले प्राण ओर मनका रूप धारण किये हुए
परमात्मा ने सृष्टि के आदि में इसी तरह आत्मा का संकल्प किया। इस कारण अज्ञानियों की यह प्रकृति
आज भी निवृत्त नहीं होती है। परम पद में आरूढ न हुए यानी अव्युत्पन्न मन, प्राण और जीवों के देहों
में देश, काल, कर्म और द्रव्यों से प्राप्त हुए विविध व्यवहार प्रवृत्त होते हैं