Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तदा द्रागित्येव यदा विकृतं वारि तत्तथा ।
तेन यावत्सरन्त्याद्यं तावन्नीता जलैः सुराः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामजी, जहाँ जहाँ
मन ने प्राण के साथ शरीर की कल्पना की, वहाँ-वहाँ सर्वज्ञ तुरन्त माया से कल्पित नगर के समान
विस्तृत इस जगज्जाल को क्षणभर में उदित हुआ वह देखता हे