Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
अथ क्षणेन सलिलं तदशेषेण निर्ययौ ।
वीच्यग्रस्फुटिताकारैर्देवैस्तारकिताम्बरम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव प्राण निरोध के अभ्यास के बिना कदापि आत्मज्ञानोन्मुख नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं।
जब प्राण स्पन्दरूप अपने कार्य में खूब व्यग्र रहता है तब मन के ईहितों (इतस्ततः संचारो में)
व्याकुल हुआ प्राण आत्मज्ञान के लिए उद्योगशील नहीं हो सकता। ये प्राण और मन परस्पर रथ ओर
सारथी हैँ । कौन एसे रथ और सारथी हैं जो कि परस्पर एक दूसरे का अनुसरण नहीं करते अर्थात्
जैसे रथ और सारथी एक दूसरे का अनुसरण करते हैं वैसे ही मन और प्राण भी आपस में अनुसरण
करते हैं