Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
व्याध उवाच ।
भगवंस्त्वादृशस्तां तामवस्थां च कथं गतः ।
कथं ध्यानप्रयोगेण तदा नोपशमं गतः ॥ १ ॥
मुनिरुवाच ।
कल्पान्तेषु विनश्यन्ति नाशैर्नानाविधात्मभिः ।
जगन्ति भ्रान्तिरूपाणि नभस्याभासरूपिभिः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त सदा ही प्राण के अधीन है यह स्वीकार कर अध्यारोप क्रम से चित्त की प्रथम उत्पत्तिमात्र से
जाग्रत् ओर स्वप्न अवस्था में चित्त और प्राण दोनों की प्रधानता है, किन्तु सुषुप्ति अवस्था में प्राण की
ही प्रधानता है, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान पहले किया जा चुका । इस समय
प्राण आदि सकलजगत् के निर्माण में चित्त की ही, स्वतन्त्रता होने से, चित्त ही प्रधान है, लेकिन सुषुप्ति
के आरम्भकाल में चित्त श्रान्त होने के कारण चेष्टा करने में असमर्थ रहता है, अपनी विश्रान्ति के लिए
ही वह प्राण की प्रधानता स्वीकार करता है, इस आशय से उसका समाधान करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, वास्तव में चित्त ही जगत् का रचयिता है । वह जिसका-चाहे वह असत्
(मिथ्या) हो, चाहे सत् (व्यावहारिक सत्) हो, चाहे सत्असत् (प्रातिभासिक) हो-जेसा संकल्प करता
है, वह उसके सामने वैसे ही खडा होता हे । चित्त ने प्राण का संकल्प किया, प्राण ही मेरी गति (मेरे
सकल व्यवहारो का निर्वाहक) हे ओर उसके बिना मे नहीं टिक सकता, यह भी उसने कल्पना की, इसी
कारण चित्त प्राणाधीन कहलाता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उनतालीसवाँ सर्ग प्राण की अपेक्षा चित्त की प्रधानता का वर्णन ओर सुषुप्ति अवस्था से स्वप्नअवस्था में आनेपर मुनिका विस्तारपूर्वक प्रलयदर्शन वर्णन ।