Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
क्वचित्कङ्कनिमग्नेन्दुयमवासवतक्षकः ।
क्वचित्पङ्कनिमग्नाधःशाखकल्पद्रुमोत्करः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
मर्दनवश नाडयो मेँ मृदुता आने एवं बाण के घाव, व्रण आदि से पूर्ण होने से भी सुषुप्ति होती है,
ऐसा कहते हैं।
मर्दनवश नाड़ियों के कोमल होने से अथवा बाण की चोट, घाव, व्रण, रुधिर आदि से भर जाने
से प्राण के कहीं विलीन होनेपर निस्पन्द सुषुप्ति होती है