Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 53–60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verses 53–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 53-60
संस्कृत श्लोक
हृदयं संप्रविष्टोऽसौ यस्याहं स पुमानपि ।
पृष्ठेनोत्सवलब्धेन शेते तृप्तोऽन्धसा सुखम् ॥ ५३ ॥
तदाश्चर्यं मया दृष्ट्वा नोक्तं किंच न कस्यचित् ।
पुनस्तस्यैव हृदयं प्रविष्टः कौतुकादहम् ॥ ५४ ॥
प्राप्तोऽस्म्योजःप्रदेशं तं तस्य तस्मिन्हृदन्तरे ।
अवेक्षितुं स्वबन्धूंस्तान्व्याप्तो वासनया तया ॥ ५५ ॥
यावत्तत्र युगस्यान्तः संप्रवृत्तोऽतिदारुणः ।
भुवनं तद्विपर्यासमागतं सह संस्थया ॥ ५६ ॥
अन्य एवाचलास्तत्र वसुधान्या च संस्थिता ।
अन्य एव ककुब्भेदस्तथान्या भुवनस्थितिः ॥ ५७ ॥
ते बन्धवः स च ग्रामः स भूभागः स दिक्तटः ।
न जाने क्व गतं सर्वं व्यूह्य नीतमिवानिलैः ॥ ५८ ॥
तदा पश्यामि भुवनं यावदन्यदवस्थितम् ।
अपूर्वसंनिवेशं तज्जगदन्यदिवोदितम् ॥ ५९ ॥
तपन्ति द्वादशादित्याः प्रज्वलन्ति दिशो दश ।
शीताश्यानाम्बुवच्छैलाः प्रवृत्ता गलितुं बलात् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
ठह रहे मणिमय महल के अन्दर
बैठे हुए ये देवराज इन्द्र इस प्रलय-काल की जलराशि में फँसकर कुंकुम-केसर से अंकित मदोन्मत्त
हाथी के कुम्भ के समान विशाल इन्द्राणी के स्तनमण्डल में रतिजनित खेद से थककर रतिखेद को
दूर करने के लिए मानों जलक्रीडा सुख के लिए तरंगरूपी झूले में झूलते हैं | खेद है, नक्षत्ररूपी
(७) “तामरसेक्षण” इस पाठ में महामुनि (तापस) के वाक्य का अनुवाद कर रहे श्रीवसिष्ठजी
का रामचन्द्रजी के लिए सम्बोधन है । “तामसेक्षण” इस पाठ में साक्षात् महामुनि का व्याध के लिए
सम्बोधन है ।
कम्पितकुसुमों को बिखेर रहे ये वायु, जलों के वेष्टन से आकाश को वेष्टितकर जिसमें देवताओं
के विमान गिर रहे हों ऐसे सुमेरु पर्वत के उद्यान की खोह में हुए और मंगल के लिए अक्षत सहित
फूलों की वृष्टि कर रहे जनों की भाँति बह रहे हैं | पर्वत के समान भयानक उमड़ी हुई लहरों की
चोटियों द्वारा ऊपर आकाश में फेंका गया, यन्त्र से आकाश में फेंके गये सोने के ढेले के तुल्य यह
जलका रूप ब्रह्मलोक में पंखुरियों से वेष्टित ब्रह्मा के आसनभूत कमल तक, जिसके बीच में ब्रह्मा
समाधिस्थ है, पहुँचकर लौटता है, बीच से नहीं लौटता । ये भयानक लहरें आकाश में मेघों की तरह
घूमती हैं, जिनका रूप हाथी, घोड़े, सिंह, सर्प, वृक्ष, पर्वत, बन और खेतों के तुल्य है । ये अत्यन्त
कठोर घुम्-घुम् शब्दरूपी गर्जन से भयानक हैं और बह रहे सुवर्णमय नगर ही इनमें बिजली-से
कौंध रहे हैं। इधर से उधर बह रहे प्रलय-सागर में पैदा हुई अलसी के फूल के सदृश काली लहरों
में यह यम भी जलवेगरूपी दूसरे यम से मानों ले जाया जाता है । ये लाखों सकल लोकपाल और
दिग्गज अपने-अपने आश्रय मेरु आदि पर्वतों और नगरों के साथ जल में डूबते हैँ । निधि-आदि
लक्ष्मी के आकाररूप पर्वतमध्यवर्ती गुफाओं में पैठे हुए जलप्रवाह को लौटाने के लिए निकल रहे,
वायु की बुड़-बुड़ ध्वनियों से उनके स्थानों की पूर्ति की प्रतीति हो रही है। पाताल, भूतल, आकाश
ओर दिगन्तों में अपार दुर्निवार जलराशि के व्याप्त हो जानेपर इन्द्र, यम, यक्ष, देवता ओर दानवों
के झुण्ड के झुण्ड अपने ग्राम, नगर, विमान ओर पर्वतों के साथ मछलियों की तरह घूमते हैं । हाय,
प्रलय-जल द्वारा इधर उधर बहाये जा रहे, भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र का जलरूपी शरीर ही उसी प्रकार
बन्धन बन गया है जैसे कि दुहने के समय प्यारी माता की जंघा बछड़ों के लिए बन्धन बन जाती
है