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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

यावत्ससकलं वारि क्वापि निर्गन्तुमुद्यतम् । विक्षुब्धवज्रवित्रस्तसपक्षाद्रीन्द्रवृन्दवत् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह मन देह के अधीन भी है ऐसा कहते हैं। देह के सौम्य रहनेपर देहगत सौम्यता को प्राण में देख रहा मन मनन करता है। देह में क्षोभ होने पर देहगत क्षोभ को प्राण में देख रहे मन को अन्य कुछ या आत्मतत्त्वविवेक नहीं दिखाई देता