Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
मध्योह्यमानकल्पाभ्रनीलशैवालजालकम् ।
विद्युद्गोरोचनाम्भोदनीलनीरजनिर्भरम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण और मन
जबतक समानरूप से अपना कार्य करते रहते हैं तब तक समान व्यवहाररूप जाग्रत चलता है, जब
प्राण इन्द्रियों को प्रेरित करने से विरत होकर विषमता को प्राप्त होता है तब विषम स्वप्न नामका केवल
मानस व्यवहार चलता है ओर मन के शान्त होनेपर सकल विक्षेपों की शान्तिरूप सुषुप्ति चलती हे