Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 138
33 verse-groups
- Verse 1एक सौ छत्तीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ सैंतीसवाँ सर्ग व्याध के पूछने पर मुनि का धारणा के अभ्य…
- Verse 2मुनिजी ने कहा : इसी समय बाणो के साथ धनुष का सर्वदा के लिए त्यागकर मुनिजनों के यम, नियम, व…
- Verses 3–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : उक्त मुनि के यों उपदेश देनेपर धनुष ओर बाणो का परित्याग कर वहींपर उस…
- Verse 5हे शत्रुतापन महाराज दशरथजी, इस प्रकार हृदय में विवेक का अंकुर पैदा हो जाने के बाद एक दिन…
- Verses 6–18द्वारा उसके स्वप्न आदि का पुनः पुनः अवलोकनकर अन्वय-व्यतिरेक से बार-बार परीक्षा करके तथ्य…
- Verse 19वेग के साथ खुल रहे अपान आदि वायुओं के छिद्रों में निकले हुए वायु से उसमें शब्द होता था तथ…
- Verse 20चारों ओर से एकत्र हो रहे वासनामय पदार्थों से वह ऐसा ठसाठस भरा वेधा था, साक्षीभूत आत्मा के…
- Verse 21कोष्ठगत अन्नरस में गुड-गुड शब्द पैदा करने में तत्पर अतएव नाड़ी मार्गों में गा रहे विद्याध…
- Verses 22–23मैं प्राणी के अत्यन्त उबड़ खाबड़ तथा भीड-भाडवाले उस हृदय में वैसे ही प्रविष्ट हुआ जैसे कि…
- Verse 24यदि कोई कहे कि वह ओज तेजः सार कैसे है ? तो इस पर कहते हैं। चूँकि उसके अन्दर त्रैलोक्य का…
- Verse 25यदि कोई शंका करे कि “स एष इह प्रविष्ट आनखाप्रेभ्यः“ इत्यादि श्रुतियो मे जीव की सकलदेह व्य…
- Verses 26–32जैसे घड़े आदि से ढकी हुई दीपज्योति की घड़े के छोटे छोटे छेदों से प्रविष्ट हुए वायुओं से र…
- Verses 33–36हे व्याध, मुझे नींद नहीं है तथापि मैं क्या स्वप्न देखता हूँ यों विचार कर रहे तदनन्तर प्रब…
- Verse 37यदि वास्तविक विचार किया जाय तो जाग्रत भी स्वचिद्विकासमात्र ही ठहरता है उससे अतिरिक्त नही…
- Verses 38–39परस्पर की दृष्टि से ये दोनों ही हैं और अपनी अपनी दृष्टि से दोनों जागरण ही हैं, ऐसा कहते ह…
- Verse 40तब मृत्यु, स्वप्न और जाग्रत से अतिरिक्त क्या है ? इसपर कहते हैं। हे महामते, मृत्यु नामकी…
- Verse 41अमूर्तआकारस्वभाव नित्य अनन्त उदित चिद्रूप परमाणु का सार ही भ्रान्तिवश जगत् कहा गया हे
- Verse 42चिदाकाश के उदर मेँ सकल अनुभवाणु वैसे ही प्रतीत होते हैं जैसे कि अवयवी के विचित्र रूपरेखाव…
- Verse 43जाग्रत का भोग करानेवाले कर्म के क्षीण होनेपर बाह्य से (जाग्रत से) निवृत्त होकर जीवाधार हृ…
- Verse 44जिस समय चित्त बहिर्मुख होता है उस समय यह जीव अपने जाग्रत् संज्ञक विकसित रूप को देखता है…
- Verse 45एकात्मक ही जीव बाहर ओर भीतर अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ ओर दिशा के रूपसे…
- Verse 46जैसे सूर्य सूर्यमण्डलमें स्थित होकर भी अपनी आभा से यहाँ भी स्थित है, वैसे ही जगद्रूप जीव…
- Verse 47अतएव सवत्मिता के वास्तविक होने के कारण उसी के परज्ञान से ही यानी मैं सवत्मिक हू, इस प्रका…
- Verse 48यद्यपि यह जीव अच्छेद्य है (छेदन-भेदन के योग्य नहीं है) ओर अदाह्य है (जलाने के योग्य नहीं…
- Verse 49अन्तर्मुख जीव अन्तरात्मरूप अपने को अन्तर्जगत्रूप में देखता हुआ स्वप्न ओर बहिर्मुख जीव आत्…
- Verse 50प्रसंगतः चुषुप्ति ओर तुरीयका तत्त्व, जो पूछा नहीं गया था, कहते है। इस तरह जाग्रत और स्वप्…
- Verse 51दृश्य के दर्शन से मेरा क्या मतलब, मैं चिरकाल तक चुपचाप चित्तव्यापाररहित होकर स्थित रहूँ,…
- Verse 52सुषुप्ति में चित्त की व्याप्ति न होने से चित् की अभिव्यक्ति न होनेपर घट आदि के समान जडता…
- Verse 53जाग्रत ओर स्वप्नो के भ्रमण से में बहुत थक गया हू । मुझे विशेष संवित् से क्या करना है । म…
- Verses 54–58ज्ञान के बिना तुरीय का पूर्णरूप तनिक भी समझ में नहीं आता | यह यथास्थित विश्व सम्यक् ज्ञा…
- Verse 59इसलिए यथास्थित जगत् के साथ स्वप्न, जाग्रत ओर सुषुप्ति ये तीनों अवस्था तुरीय में अन्तर्भू…
- Verse 60जगत् कारण से उत्पन्न नहीं है, किन्तु शान्त अजन्मा ब्रह्म ही इस प्रकार जगद्रूप से स्थित ह…
- Verse 61उक्त का ही पुनः वर्णन करते हुए प्रकरण का उपसंहार करते है । अद्वितीय ब्रह्म में सृष्टि के…