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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

स्वार्थमात्रोऽद्य तस्यान्तः परकृत्यं न कस्यचित् । कचति स्वार्थसत्तायामेतदेव वपुर्यतः ॥ २२ ॥ श्रीराम उवाच । मनः प्राणवशादेव मनुते किं महामुने । स्वरूपं मनसो नास्ति तस्मात्तत्केवलं च किम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं प्राणी के अत्यन्त उबड़ खाबड़ तथा भीड-भाडवाले उस हृदय में वैसे ही प्रविष्ट हुआ जैसे कि श्रेष्ठ पुरुष पुरुषों के अवयवो से ठसाठस भरे नर-समूह में प्रविष्ट होता हे । उसके बाद तेज स्वरूप मैं उसके हृदय के मध्य में उदराग्निरूप तेज के सार को, जो समीपस्थ होनेपर भी विविध नाडीमार्ग से प्राप्य होने के कारण दूर स्थित-सा था, प्रयास से वैसे ही प्राप्त हुआ जैसे कि रात्रि में सूर्यप्रभा चन्द्रमा को प्रयत्न से प्राप्त होती हे