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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 26–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verses 26–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 26-32

संस्कृत श्लोक

अतः सर्वमिदं ब्रह्म तच्च सर्वात्मकं यदा । तदा विश्वमिदं विष्वगस्त्येव च यथास्थितम् ॥ २६ ॥ अस्ति चित्तादि देहादि तद्ब्रह्मैव च तद्विदाम् । यादृक्तत्तद्विदामेतदस्माकं विषये न तत् ॥ २७ ॥ यथेदं त्रिजगद्ब्रह्म यथेति विविधात्मकम् । अत्रेमं राजपुत्र त्वं वर्ण्यमानं क्रमं श्रृणु ॥ २८ ॥ अस्ति चिन्मात्रममलमनन्ताकाशरूपि यत् । सर्वदा सर्वरूपात्म न जगन्न च दृश्यता ॥ २९ ॥ सर्ववित्त्वात्तु तेनेदं मनस्त्वं चेतितं स्वतः । रूपमत्यजता शुद्धं बुद्धमाधिविवर्जितम् ॥ ३० ॥ मनसा कल्पितं तेन यद्वै सरणमात्मनः । तदेतत्प्राणपवनं विद्धि वेद्यविदां वर ॥ ३१ ॥ प्राणतैषा यथा तेन कल्पितेवानुभूयते । तथैवेन्द्रियदेहादि दिक्कालकलनादि च ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे घड़े आदि से ढकी हुई दीपज्योति की घड़े के छोटे छोटे छेदों से प्रविष्ट हुए वायुओं से रक्षा होती हे क्योकि यदि छेद बिलकुल बन्द कर दिये जाय तो दीपक बुझ जाय, वैसे ही चारों ओर इन्द्रियाभिमानी देवताओं द्वारा चारों द्वारोंपर सुरक्षित उक्त जीवाधार ओज में (तेजोधातु में) मैं चुपचाप बिना किसी के जाने बूझे प्रविष्ट हो गया । उसके उपरान्त मेँ साक्षात्‌ उक्त जीव के उपाधिभूत मनोमय विज्ञानकोश से परिवृत आनन्दमय कोश में जो आनन्दमय कोश द्वितीया के चन्द्रमा के किरणों के (चाँदनी के) सदृश स्वच्छ था, सफेद बादल के टुकड़े के समान मनोहर था, मक्खन के गोले के समान कोमल ओर दूध के बुद्बुद्‌ के समान सुन्दर था ऐसा प्रविष्ट हुआ जैसे कि मनोहर गन्ध वायु में प्रविष्ट होती है , जसे सूर्य चन्द्रमा में प्रविष्ट होता है अथवा जैसे दूध मिट्टी के पात्र मेँ प्रविष्ट होता है । पूर्व स्थानों में प्रवेशवश जो थकान मुझे हुई थी वह यहाँ बिलकुल नहीं हुई । जैसे अपने हृदय में स्थित ओज मेँ मैं स्वस्थ रहता था वैसे ही वरहा पर भी स्वस्थता के साथ रहते हुए मैंने अपने स्वप्न जगत्‌ की भोति उसका स्वप्नरूप जगत्‌ भी पूरा का पूरा देखा । उसके स्वप्न जगत्‌ में भी सूर्य थे, पर्वत थे, सागर थे, देवता, राक्षस और मनुष्य थे, नगर थे विशाल जंगल थे, अन्यान्य लोक थे, दिशाएँ थी, साता द्वीप, सातों सागर, भूत, भविष्यत्‌ ओर वर्तमान काल और इन्द्रियो के क्रम सब विद्यमान थे, प्रलय, क्षण सब ऋतुएँ स्थावर जंगम सब कुछ विद्यमान था । वहाँपर वह स्वप्नदर्शन अनादि प्रवाह स्थित तथा प्रसिद्ध जगत्‌ के तुल्य रहा मैं निद्रा के बाद जाग्रत अवस्था में अतिशयेन स्थित ही रहा, क्योकि जाग्रत्‌ के अन्त में निद्रा आई ही नहीं