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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

संविदं संविदा गृह्णंस्तान्बाह्येऽन्तरपि क्षणात् । अहं प्रसृतवांस्तत्र तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३ ॥ तत्संविदि तथैवाथ यावत्परिणमाम्यहम् । भुवनं दृष्टवांस्तावत्सर्वं द्विगुणितं स्थितम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : उक्त मुनि के यों उपदेश देनेपर धनुष ओर बाणो का परित्याग कर वहींपर उसने मुनिजन के-से आचरण अपनायें ओर अयाचित जो कुछ मिल जाता था उससे अपनी गुजर करे लगा तदुपरान्त मुनियों के से आचरणवाले उसके हृदय में थोडे ही दिनों मेँ सारासार विवेकशीलता ने वैसे ही प्रवेश किया जैसे फूल अपनी कली के विकास आदि क्रमसे होनेवाली मनमोहनी सुगन्ध से लोगों के हृदय मे प्रवेश करता हे