Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यदा तदात्मकात्मैकपरो हृदि सहस्थितम् ।
अप्रधानीकरोत्येतच्चित्तं स्वार्थस्वभावतः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
कोष्ठगत अन्नरस में गुड-गुड शब्द पैदा करने में तत्पर अतएव नाड़ी मार्गों में गा रहे विद्याधर
पथिक के सदृश इधर उधर संचार कर रहे तथा द्विमात्र एकमात्र और अर्धमात्र युक्त गतिवाले वायुओं से
घिरा था