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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । देह एवेह नास्त्येव स्वानुभूतोऽप्ययं निजः । मनसः कल्पनात्मेदं वपुः स्वप्ने गिरिर्यथा ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि वह ओज तेजः सार कैसे है ? तो इस पर कहते हैं। चूँकि उसके अन्दर त्रैलोक्य का भान होता है, अतः वह त्रैलोक्य का दर्पण है, त्रैलोक्यस्थित पदार्थो का वह दीपक के समान प्रकाशक है, सब पदार्थो के अस्तित्व का (सत्ता) सम्पादक है तथा जीव (जीववेशधारी परमात्मा) उस तेज में रहता हे । भगवती श्रुति ने भी कहा है-उसके मध्य में उत्पन्न सूक्ष्म अग्नि की लूर है उस लूर के बीच में परमात्मा बैठा है, वह ब्रह्म है, वह शिव है, वह अविनाशी है, वह परम स्वराट्‌ है