Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
तच्चित्तमपि नास्त्येव चेत्यार्थाभावयोगतः ।
सर्गादौ कारणाभावाद्दृश्यानुत्पत्तिहेतुतः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि “स एष इह प्रविष्ट आनखाप्रेभ्यः“ इत्यादि श्रुतियो मे जीव की सकलदेह
व्यापकता सुनने में आती है, ऐसी स्थिति में वह तेजोधातु में (ओज में) ही कैसे स्थित है ? इसपर
कहते हैँ ।
जैसे यद्यपि सूर्य द्वारा विकसित पुष्प में उसकी सुगन्धि ओर शीतलता सर्वत्र विद्यमान है फिर भी
केसर से युक्त उसके मुँह मेँ सुगन्धि ओर शीतलता विशेषरूप से रहती है वैसे ही यद्यपि सर्वव्यापी
आत्मा जीव बनकर नख से लेकर शिखा तक सर्वत्र प्रविष्ट हुआ तथापि तेजोधातु में (ओज मेँ) वह
विशेष रूपसे स्थित है